Culture

Gogamedi Temple and Gogamedi Fair Hanumangarh Rajasthan

Gogamedi Temple and Gogamedi Fair Hanumangarh Rajasthan

In the famous pilgrimage site of North India and Bagd Dham Gogameri, the folk deity of Jahveer Shri Gogaji Maharaj is a magnificent temple. Jadhavir Gogaji Maharaj’s mind remains in the main temple. Gogaji comes to Smarath place of Maharaj, along with Rajasthan, to come from India and seek the blessings of devotees. In particular, the recognition of Gogaji is more pronounced in Uttar Pradesh. In the memory of Gogaji, every year, in the month of Bhadwe fills a huge fair of Gogamedi for one month. This time Gogameri fair will start from 26th August to 25th September. Here the police-administration chabisan chak chouband stays with few hours of services. The fair magistrate is also posted. In addition to the fair, there is a displacement of exotic pilgrims in Gogamadi. In the fair area, shops of various types of accessories are decorated in temporary markets. By the way, Gogamadi resides for one month, like Delhi-Mumbai. People from dozens of villages in the surrounding area coming to Gogaji’s canopy get jobs for one month. The Varsangan of Gogaji Fair is also done by the Department of Devotion by pomp. The most special thing is to see that Gogaji’s all-religion is recognized all around. In the Gogaji temple, there is a special precedent of communal goodwill and brotherhood; Hindus and Muslims-Sikh-Christians are seen in the worshipers of Gogaji, who are bowing down together. Therefore, Gogaji is also called by the name of Goddess. During the fair, the devotees of Gogaji singing songs of Dhan-Nagand and Damru, Sarangi, regardless of heat and humidity, singing songs of Jay-jai Bagdar Gugavir, wearing yellow clothes, worshiping Kanak, Gogbhakat with a stick on his body While carrying out a trail of Gogaji in a group, it is called Neja. During the fair here, Goghbhaktas Josh is worth seeing. In Prasad, offered to Gogaji, Uttar Pradesh, Bihar, Madhya Pradesh, Uttarakhand, Delhi, Chandigarh, Punjab, Haryana, Rajasthan, including pulses, onions, nariel, flag, blue cloth, Khile-Makhana, dessert, decoration and make-up accessories etc. , Jummu-Kashmir, Pune Maharashtra, and worshipers of other states of India, Gorakhnath ji’s Tapophoomi Gaurakshitila Dhuna and Gogaji Temple, Received while vows to ask, after the vows Puri devotees they come Gogamedi to visit again Poop. Gogajee’s blue horse is famous in Bagd Dham. It is said that Gaggadh Nath, given by Guru Gauraknath ji, was given to Mata Bachhal by showing her mercy to the barren horse of the court, with the glory of her, she gave birth to a powerful, divine and strong horse, which was later leela horse Has become famous by name. He was a state-of-the-art velocity driver and a trusted partner of Jahveer Gogaji. Even today, devotees and people of the Gogamadi worship the blue horse. The prevalence of village-village Khagedi, the popularity of Gogaji, is certified by this saying that in Rajasthan, there will be more number of Khyadhi and Jal tree and Gogaji’s Than Yani (Medi). At present, the Gogaji temple is being renovated with the expenditure of crores rupees. The magnificent nature of the Gogaji temple will be seen. In the near future, Gogamedia can be seen on the world screen. The Gogaji Temple is a self-reliant temple, with all the care of it is the Devasthan Department. Gogaji Mandir is the official priest of the Devasthan Department, who perform the worship of devotees who come here, of which Madan Swamy is the main person in the form of a government priest, who is doing Gogaji’s arti and puja on both occasions in the morning and evening. Let the devotees perform visually.

Gogamedi Temple and Gogamedi Fair Hanumangarh Rajasthan

उत्तर भारत की प्रसिद्ध तीर्थ स्थल एवं बागड़ धाम गोगामेड़ी में लोक देवता जाहरवीर श्री गोगाजी महराज का भव्य मंदिर है। मुख्य मंदिर में जाहरवीर गोगाजी महाराज की स्माधी बनी हुई है। गोगाजी महाराज की स्माधि स्थल पर राजस्थान सहित भारत के कोने-कोने से श्रद्धालु मन्नत मांगने के लिए आते है। खास कर उत्तर प्रदेश में गोगाजी की मान्यता ज्यादा बताई जाती है। गोगाजी की याद में हर वर्ष भादवे के महिने में लगातार एक माह तक गोगामेड़ी का विशाल मेला भरता है। इस बार गोगामेड़ी मेला 26 अगस्त से प्रारंभ होकर 25 सितम्बर तक चलेगा। यहां पुलिस-प्रशासन चौबिसों घंटो सेवायें देते हुए चाक चौबन्द रहता है। मेला मजिस्ट्रेट भी तैनात रहता है। मेले के अलावा भी गोगामेड़ी में बाहरमासी श्रद्धालुओं का अवागमन रहता है। मेला क्षेत्र में अस्थाई बाजारों में नाना प्रकार के साजो सामान की दुकानें सजी हुई देखी जाती है। वैसे देखा जाये तो एक माह के लिए गोगामेड़ी ऐसे बसती है, जैसे मानों दिल्ली-मुंबई हो। गोगाजी की छात में आने वाले आस-पास क्षेत्र के दर्जन भर गावों के लोगों को एक माह के लिए रोजगार मिल जाता है। गोगाजी के मेले का विर्सजन भी देवस्थान विभाग द्वारा धूमधाम से किया जाता है। सबसे विशेष बात तो ये देखने को मिल रही है कि गोगाजी की सर्व-धर्म सहीत चारों ओर मान्यता है। गोगाजी मंदिर में साम्प्रदायिक सद्भावना एवं भाईचारे की खास मिसाल देखने को मिल रही है, इन्हे पुजने वालों में हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई एक साथ मत्था टेकते हुए गोगाजी के दर्शन करते है। इसलिए गोगाजी को लोकदेवता के नाम से भी पुकारा जाता है। मेले के दौरान गोगाजी के भक्तजन गर्मी व उमस की बिना परवाह किये ढोल-नगाड़ों व डमरू, सारंगी के साथ नाचते गाते जय-जय बागड़ वाले गुगावीर के गीत गाते, पीले वस्त्र धारण किये, कनक दण्डवत करते, गोगाभक्त अपने शरीर पर छड़ी से वार करते हुए एक समुह में गोगाजी का एक निशान लेकर चलते है जिसे नेजा कहा जाता है। मेले के दौरान यहां गोगाभक्तों का जोस देखने लायक होता है। गोगाजी को अर्पित किये जाने वाले प्रसाद में दाल, प्याज, नारीयल, ध्वजा, नीला कपड़ा, खील-मखाणा, मिठाई, सजावट एवं श्रृंगार का सामान आदि लेकर उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, उत्तराखण्ड, दिल्ली, चण्डीगढ़, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, जम्मु-कश्मीर, पुणे महाराष्ट्र सहित भारत के अन्य राज्यों के श्रद्धालु गुरू गोरक्षनाथ जी की तपोभूमि गौरक्षटीला धुणा एवं गोगाजी मन्दिर में मत्था टेक कर पुजा अर्चना करते हुए मन्नतें मांगते है, भक्तजनों की मन्नतें पुरी होने के बाद वे पुन: बागड़ यात्रा करने के लिए गोगामेड़ी आते है। बागड़ धाम में गोगाजी का नीला घोड़ा प्रसिद्ध है। बताया जाता है कि गुरू गौरक्षनाथ जी की ओर से प्रदत्त गुग्गल प्रसादी को माता बाछल ने करूणा का परिचय देते हुए दरबार की बांझ घोड़ी लीलण को दी, उसके प्रताप से उसने शक्तिशाली, दिव्य व तेज पुन्ज घोड़े का जन्म दिया, जो आगे चलकर लीला घोड़ा के नाम से प्रसिद्ध हुआ। वह अत्याधुनिक वेग से चलने वाला तथा जाहरवीर गोगाजी का विश्वसनिय साथी था। गोगामेड़ी में आज भी आने वाले भक्त-जन नीले घोड़े की पुजा करते है। गांव-गावं गुगो, गांव-गांव खेजड़ी, गोगाजी की मान्यता की व्यापकता इस कहावत से प्रमाणित होती है कि राजस्थान में खेजड़ी व जाळ के पेड़ और गोगाजी के थान यानी (मेड़ी) अधिक संख्या में मिलेगें। वर्तमान में गोगाजी मंदिर पर करोड़ोंं रूपयों के खर्च से जिर्णोद्धार किया जा रहा है। गोगाजी मंदिर का भव्य स्वरूप देखने को मिलेगा। निकट भविष्य में गोगामेड़ी को विश्व पटल पर देखा जा सकता है। गोगाजी मंदिर आत्मनिर्भर मंदिर है, इनकी देखरेख सहित सभी प्रकार का जिम्मा देवस्थान विभाग है। गोगाजी मंदिर में देवस्थान विभाग के सरकारी पुजारी है जो यहां आने वाले श्रद्धालुओं को पुजा-अर्चना करवाते है, जिनमें से सरकारी पुजारी के रूप में मदन स्वामी मुख्य है, जो सुबह-सायं दोनों समय गोगाजी की आरती व पुजा-अर्चना करते हुए गोगाजी के भक्तों को साक्षात दर्शन करवाते है।

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