Culture

मुक्तिधाम मुकाम – नोखा बीकानेर राजस्थान (Mukti Dham Mukam)

मुक्तिधाम मुकाम बीकानेर से लगभग 80 कि.मी. तथा नोखा से 15 कि.मी. की दूरी पर स्थित है जो केवल सड़क से जुड़ा है। वैसे नोखा तक रेलमार्ग भी है। समराथल के समान ही मुक्तिधाम मुकाम का भी महत्व है। मुकाम धाम बिश्नोई समाज की श्रद्धा एवं आस्था का मूल केन्द्र है। यहां पर समाधी मन्दिर है जो कि गुरु जम्भेश्वर भगवान की समाधि पर निर्मित है।
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जांभोजी महाराज के विक्रम सम्वत् 1593 मिगसर बदी 9 को बैकुण्ठवास के बाद तालवा गांव के निकट मुकाम में एकादशी के दिन समाधि दी गईं। उनके पवित्र शरीर का अन्तिम पड़ाव होने से यह तीर्थ मुकाम के नाम से विख्यात है तथा समाज में यह आम धारणा है कि यहां निष्काम भाव से सेवा करने वालों को मुक्ति मिलती है। इसीलिए इसका नाम मुक्तिधाम मुकाम है।
Mukti Dham Mukam
गुरु महाराज ने निर्वाण से पूर्व खेजड़ी तथा जाल के वृक्ष को अपनी समाधि का चिन्ह बताया। उनके अनुसार ठीक उसी स्थान पर जहां आज समाधि है। उनको समाधि देने के लिए खोदने के दौरान 24 हाथ नीचे एक त्रिशूल मिला जो कि आज भी निज मन्दिर मुक्तिधाम मुकाम पर लगा हुआ है।

इसी सम्वत् की पौष सुदी 2 सोमवार को समाधि- मंदिर की नींव रखी गई और सम्वत् 1597 चैत्र सुदी 7 शुक्रवार को मुख्य मंदिर (निज मंदिर) बनकर तैयार हो गया। यह मंदिर रणधीर जी बावळ, जो कि जांभोजी महाराज के मुख्य और प्रिय शिष्यों में से एक थे, ने बनवाया था।

इस मंदिर को बनाते समय कहते हैं कि शाम के समय जब मजदूरों को मजदूरी दी जाती थी तो मजदूरों की गणना करते समय एक मजदूर कम होता था। श्री रणधीरजी बाबल सोवन नगरी से जो अखूट स्वर्ण सीला लाये थे, उसी से वे मंदिर का निर्माण करवा रहे थे,

परंतु बीच में ही उनके स्वर्गवास हो जाने के कारण मंदिर का ऊपरी भाग अधूरा रह गया था, जिसे बाद में बिश्नोई संतों ने समाज की सहायता से पूर्ण करवाया था। यहां हर वर्ष मुख्य रूप से दो मेले लगते हैं। फाल्गुन की अमावस्या तथा आसोज की अमावस्या पर, जिसका प्रारम्भ वील्होजी ने किया था।



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