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GADIYA LOHAR History | Miltory of Maharana Partap |लोहार जाति की उत्पत्ति | लोहार समाज का इतिहास

GADIYA LOHAR History | Miltory of Maharana Partap |लोहार जाति की उत्पत्ति | लोहार समाज का इतिहास

राजस्थान की गाड़िया लोहार एक ऐसी अनोखी घुमक्कड़ जाति है, जो अपना घर कभी नहीं बनाती, बल्कि कलात्मक बैलगाड़ी ही इनका चलता-फिरता घर है। इनके जीवन के विविध रंग इस गाड़ी में ही सिमटे हुए हैं। जन्म, मरण, घरण, गौना आदि सब कुछ बैलगाड़ी में ही होते हैं।

गाड़िया लोहार की मान्यता है कि जब वे महाराणा प्रताप के सहयोगी के रूप में युद्ध के बाद लौट रहे थे, तब रास्ते में इन्हें एक रथ पर बैठे भगवान मिले। दरअसल, भगवान के रथ की धुरी टूट गयी थी। गाडि़या लोहार ने भगवान के रथ की धुरी जोड़ दी। तब भगवान ने खुश होकर वरदान दिया कि लोहे के काम में तुम्हें कभी पराजित नहीं होना पड़ेगा। बस, तब से ही गाड़िया लोहार पीढ़ी-दर-पीढ़ी पैतृक कार्य करते आ रहे हैं।

GADIYA LOHAR VIDEO

ये लोग कलात्मक दृष्टि से तो जरूर सम्पन्न हैं, लेकिन आर्थिक दृष्टि से सामान्य हैं। लोहे को पीटकर ये अपनी आजीविका चलाते हैं। आग से गर्म लोहे को निकालकर पुरुष एरन पर रखते हैं और इनकी स्त्रियां भारी हथोड़े से चोट करती हैं। ये लोहे के तरह-तरह के सामान और औजार भी बनाते हैं। इन लोगों की कलात्मक गाड़ियाँ कई सुन्दर तरीके से सजी होती हैं। गाड़ी के विविध हिस्सों में पीतल के गोल कलात्मक पतरे कील से जुड़े रहते हैं। गाड़ी के पहिये भी भव्य और भारी होते हैं। हां, ये पहिये देखने में किसी ऐतिहासिक रथ से कम नहीं लगते। इनकी गाड़ी का रंग गहरा काला होता है, ताकि इनकी सुंदर-सुंदर बहू-बेटियों पर किसी की बुरी नजर नहीं पड़ सके।


इस जाति में पुरुष धोती व बंडी पहनते हैं जबकि महिलाएं कलात्मक पहनावा पहनती हैं। गले में चांदी का कड़ा, हाथों में भुजाओं तक कांच, लाख, सीप व तांबे की चूडि़यां, नाक में लंबी नथ, पांव में भारी-भारी चांदी के कड़े, कानों में पीतल या सीप की बड़ी-बड़ी बालियां पहनती हैं। सिर पर आठ-दस तरह की चोटियां गूंथती हैं। जिनमें कौडि़यों की माला सलीके से गूंथी होती है। महिलाएं अपने पैरों की लंबाई से आधा फुट छोटा छींटदार लहंगा पहनती हैं। कमर में कांचली पहनती हैं। ये अपने बदन पर प्राकृतिक फूल-पत्तियों की चित्रकारी विविध रंगों से करती हैं तथा दोनों हाथों में तीन-चार गोदना भी गुदवाती हैं। दरअसल, गोदना इस जाति की पहचान का विशेष चिन्ह भी माना जाता है।

इस जाति में कई अनोखी दृढ़ प्रतिज्ञाएं हैं, जैसे सिर पर टोपी नहीं पहनना, पलंग पर नहीं सोना, घर का मकान नहीं बनाना, चिराग नहीं जलाना, कुएं से पानी नहीं भरना, हुक्के की नली छोटी रखना, कमर में काला नाड़ा बांधना, पराई जाति की स्त्री से विवाह नहीं करना, मृत्यु पर ज्यादा विलाप नहीं करना आदि। इनके कबीले के मुखिया के हुक्म के कारण ये एक से अधिक कंघा नहीं रखते। कंघा टूटने पर उसे जमीन में दफन कर नया कंघा खरीदते हैं। नए कंघे को पहले कुलदेवी की तस्वीर के समक्ष रख पवित्र किया जाता है, इसके उपरांत ही इसे बाल संवारने के लिए काम में लिया जाता है।

इन लोगों में जब शादी होती है तो पति-पत्नी अपनी पहली मधुर रात गाड़ी में ही हंसी-खुशी गुजारते हैं तथा यह भी तय करते हैं कि वे अपनी भावी संतान को चलती बैलगाड़ी में ही जन्म देंगे, ताकि उसमें भी घुमक्कड़ संस्कार समा सकें। इन लोगों में विवाह के तरीके अनोखे होते हैं। दुल्हन पाने के लिए एक किलो से लेकर दस किलो तक चांदी दुल्हन के पिता को भेंट करनी होती है। इनके विवाह में मयूर पंख का बड़ा महत्व है। अग्नि के फेरे के उपरांत दुल्हन दूल्हे को एक मयूर पंख भेंट करती है। जिसका मतलब होता है- ‘इस सुंदर पंख की तरह अपनी नई जिंदगी का सफर प्रकृति के सुंदर स्थलों पर भ्रमण कर बिताएं।’


ये लोग माचिस से कभी आग नहीं जलाते, बल्कि इनकी अंगीठी में सुलगते कोयले के कुछ टुकड़े हमेशा पड़े रहते हैं, ये उसी अंगीठी में नए कोयले झोंककर आग सुलगाते हैं। ऐसी लोक मान्यता है, नई आग जलाने से पुरखों की आत्माएं परेशान करने लगती हैं। ये लोग अक्सर कुत्ते पालते हैं। इनका काफिला जब भी कहीं से गुजरता है, तो प्रत्येक बैलगाड़ी के नीचे नाटे कद के दो-तीन कुत्ते चलते नजर आते हैं। इनके परिवार में जब किसी शिशु का जन्म होता है तो उसके 21 दिन उपरांत अनोखी रस्म अदा की जाती है। उसकी पीठ पर लोहे की गर्म छड़ दागी जाती है, ताकि वह गाड़िया लोहार की संतान कहला सके (वैसे एक गाडिया लुहार बिरादरी के भाई ने बताया कि ऐसी कोई प्रथा नहीं है उन्होंने बताया कि इस समाज का पुष्कर, राजस्थान मे ऑफिस है जो कि “गाडिया लुहार युवा संगठन” के नाम से है। समाज के लिए शिक्षा व भूमिहीनन परिवार जो अभी भी एक गाँव से दूसरे गाँव घूमने के लिए मजबूर है। तो ऐसा कार्य करते है इस संगठन में समाज के युवा समाज हित में अपनी सवेछा से कार्य करते है। इनका मूल जो कार्य है इस समुदाय को अपने हक अधिकार के लिए अवरनेश संगठित करना है)

ये लोग किसी भी मौसम की मार से नहीं घबराते। ये अपने समूह में गांव-शहर से दूर या जंगल में अपने तंबे डेरे में लगाते हैं और कड़ी मेहनत कर अपनी आजीविका चलाते हैं। राजस्थान की घुमक्कड़ जाति के रूप में ‘गाड़िया लोहार’ अपनी पहचान एवं रहन-सहन की विचित्रता के कारण अन्य घुमक्कड़ जातियों के मध्य अपना स्वतंत्र अस्तित्व रखते हैं।


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